भक्त का जीवन संसार का सर्वोच्च आदर्श होता हैं


वैष्णव पत्रिका :-आजकल कुछ लोगों की ऐसी धारणा हो गयी है कि भक्ति का साधन अत्यन्त सहज है, पाप-ताप दुराचार-अनाचार में फँसे रहते हुए भी हम पूर्ण भक्त बन सकते हैं। इसी से आज भारत में भक्तों की भरमार है। लोग काम, क्रोध, लोभ या दभ्भवश भगवान् के दो-चार नाम लेकर या भक्तों की -सी पोशाक पहनकर अपने को भक्त प्रसिद्ध कर देते हैं। यह नहीं सोचते कि भक्त को अग्नि-परीक्षा देनी पड़ती हैं, विष की घँूटको प्रसाद समझकर आदरपूर्वक पी जाना पड़ता है तथा सारे भोग-विलास और धन-जन की आसक्ति छोड़कर प्रभु के प्रति सर्वात्म रूप से आत्म-समर्पण करना पड़ता है। ज्ञान से भगवत् स्वरूप को समझकर स्वकर्म के द्वारा भगवान् की शुद्ध उपासना करने से ही भक्ति सिद्ध होती है। भक्त तो भगवान् का निज-जन होता है। उसके योग-क्षेम का, उसके रक्षणावेक्षण का सारा भार भगवान् उठा लेते हैं, अतएव भक्त सब प्रकार के पाप-ताप से मुक्त हो जाता है। वह संसार का सर्वोच्च आदर्श होता है; क्योंकि उसके अंदर भगवान् के दिव्य गुणों का विकास हुआ करता हैं। ऐसा भक्त ही भगवान् को प्यारा होता है और ऐसे ही भक्त का उद्धार करने के लिये भगवान् जिम्मेवारी लेते है। भक्त तो अपना ह्दय, मन-बुद्धि, शरीर-परिवार, धन, ऐश्वर्य- सब कुछ भगवान् के चरणों में अर्पण कर निश्चित हो जाता हैं। वह सारे संसार में अपने स्वामी को व्याप्त देखता हैं, इसीलिये वह अखिल विश्व के सकल चराचर जीवों के साथ प्रेम करता है और उनकी सेवा करने के लिये पागल हुआ-सा घूमता हैं।
                                                                           सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत ।
                                                                                मैं सेवक सराचर रूप स्वामि भगवंत ।।

ऐसे अनन्य भक्त का जीवन प्रभुमय होता है, उसके समस्त कार्य प्रभु के कार्य होते हैं, वह प्रभु के ही परायण होता है, एकमात्र प्रभु का ही भजन करता है, संसार की किसी वस्तु में आसक्त नहीं होता और सर्वभूतों के प्रति, अपने साथ वैर रखने वालों के प्रति भी निर्वैर रहता है। वह पहचानता है केवल अपने एक प्रभु को और संसार में सर्वथा एवं सर्वदा केवल उसी की लीला का विस्तार देखना है। जीवन-मरण दोनों ही उसके लिये समान सुखप्रद होते हैं। वैष्णव पत्रिका

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