सोमवार की कहानी

सोमवार की कहानी

सोमवार की कहानी . वैष्णव पत्रिका :- एक बार शिवजी पार्वती जी पृथ्वी पर सैर करने आए। पार्वती जी को भूख लग गई। शिवजी पार्वती के संग एक गांव में गए और बोले- अलख निरंजन ! भिक्षा मिलेगी। लेकिन किसी ने भी भिक्षा नहीं दी। सभी ने तिरस्कार किया और कहा हटे कटे आदमी होकर भी मांग रहे हों पता नहीं ऐसी सुन्दर स्त्री कहा से ले आए।इसी तरह घर-घर घूमते-घूमते एक बुढ़िया माई के घर पे आए और अलख निरंजन भिक्षा मिलेगी कहा। बुढ़िया बहुत ही गरीब थी। उसके घर में कुछ भी नहीं था। फिर भी उसने कहा- मॉ कहॉ जा रही हो ? बुढ़िया ने कहा आपके लिए कुछ सामग्री लेने जा रही हू। शिवजी ने कहा- कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है अपने भण्डार को जाकर संभाल। बुढ़िया ने जाकर देखा-तो हत्प्रभ रह गई कि घर में खाने-पीने के समान का अखण्ड भण्डार भर गया। उसने भोजन बनाया और तीन पतल परोसी शिवजी पार्वती जी और नंदिया की। शिवजी ने कहा मॉ तीन पतल और परोसा। बुढ़िया ने कहा किसके लिए परोसू मेरे तो कोई नहीं है। शिवजी ने कहा-तेरे, बेटे, बहु को आवाज दे। बुढ़िया ने आवाज लगाई और बेटा, बहू हाजिर हो गए। शिवजी खा पीकर जाने लगे तक इधर बुढ़िया के घर में धन दौलत खाने-पीने के भण्डार भर गए और उधर गॉव में जिन लोगों ने ना किया उन सभी के धन-दौलत के भण्डार घट गए। अब तो गांव वाले बुढ़िया के पास आए और बोले तुम कुछ जादू जानती हो जो हमारा सारा धन सम्पति तुम्हारे पास आ गया बुढ़िया ने कहा- एक अलख निरंजन आया था। उसी के कारण मेरे तो धन हुआ है। गांव वाले सोचने लगे अब क्या होगा। बुढ़िया फिर आपके पीछे क्यो दौड़ रही है। शिवजी ने कहा- पृथ्वी के प्राणीयो की भूख शान्त नहीं होती है। सब कुछ दे दिया फिर भी पीछे-पीछे दौड़ रही है। जब बुढ़िया शिवजी के पास आई तो शिवजी ने पूछा अब क्या चाहिए ? बुढ़िया ने कहा- मुझे कुछ नहीं चाहिए सिर्फ आपका असली परिचय चाहिए। शिवजी ने अपना असली परिचय दिया और बुढ़िया उनके पांव में गिर पड़ी- हे प्रभु ! गांव वालों को जैसे थे वापस वैसा कर दीजिए। शिवजी ने कहा- अलख निरंजन ! और सब जैसा था वैसा ही हो गया और सभी गांव वाले हर अतिथि का सत्कार करने लगे। हे शिवजी ! जैसे बुढ़िया को दिया वैसे सबको दे। जैसा गांव वालों के साथ हुआ वैसा किसी के साथ ना हों:वैष्णव पत्रिका 

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