शुक्रवार की कहानी

शुक्रवार की कहानी

शुक्रवार की कहानी वैष्णव पत्रिका:- एक समय की बात है एक नगर में एक बुढ़िया और उसका बेटा रहता था। कुछ समय बाद उस बुढिया ने अपने बेटे का विवाह कर दिया । विवाह के बाद वह अपनी बहू से सारे काम करवाने लगी। बहू को किसी न किसी बात से परेशान करने लगी। बहू घर का सारा काम करती थी और बुढिया उसे ठीक से खाना भी नहीं देती थी। यह सब उसका बेटा चुपचाप देखता था और इन सब से परेशान होकर उसने शहर जाने का फैसला ले लिया। उसने अपनी माँ और पत्नी को शहर जाने की बात बताई । बुढिया के बेटे ने अपनी पत्नी से कुछ निशानी देने के लिए कहा । तो वह रोने लगी कि मेरे पास तो तुम्हे देने के लिए कुछ नहीं है और उसके चरणों में गिर गई । इसके बाद वह शहर चला गया । एक दिन बुढि़या की बहू घर के काम से बाहर गई । वहां उसने देखा कि बहुत सी महिलाये संतोषी माता की पूजा कर रही है। उसने उन महिलाओ से व्रत की विधि जानी । तब उन महिलाओ ने उसे कहा कि एक लौटे में पानी, गुड़ और चने का प्रसाद लेकर माँ कि पूजा करे और इस दिन खटाई का सेवन बिलकुल न करे । उसने ऐसा ही किया मां की कृपा से उसके पति की चिट्ठी और पैसे आने लगे। उसने मां से कहा कि हे मां जब मेरे पति आ जाएंगे तो मैं उद्यापन करूंगी। संतोषी माता की कृपा से उसका पति भी आ गया । इसके बाद उसने व्रत का उद्यापन किया। लेकिन उसकी पड़ोस में रहने वाली एक स्त्री उससे बहुत अधिक चिड़ती थी । उसने उनके बच्चों को खटाई खाना सीखा दिया । इससे माँ क्रोधित हो गई और उसके बाद उसके पति को राजा के सिपाही पकड़कर ले गए । इसके बाद बुढ़िया की बहू ने मां से अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी और फिर से उद्यापन किया । जिसके बाद उसकी सभी परेशानियां समाप्त हो गई और उसे पुत्र की प्राप्ति हुई। वैष्णव पत्रिका

 

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