शस्त्र और शास्त्र के ज्ञाता : भगवान परशुराम

वैष्णव पत्रिका :- भगवान नारायण के 6वें अवतार, भगवान श्री परशुराम जी महाराज त्रेतायुग के एक विद्वान व दिव्य शक्तियों से परिपूर्ण श्रेष्ठ ऋषि थे । वैदिक वृत्तान्तों के अनुसार भगवान श्री परशुराम जी महाराज का जन्म ब्राह्मण महर्षि भृगुश्रेष्ठ जमदग्नि द्वारा सम्पन्न पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न देवराज इन्द्र के वरदान स्वरूप पत्नी रेणुका के गर्भ से, वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीय को हुआ था । वे भगवान नारायण के आवेशावतार थे । वे ब्राह्मण कुल के भार्गव गोत्र की सबसे आज्ञाकारी संतानों में से एक थे, जो सदैव अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करते थे । वे सदैव बड़ों का सम्मान करते थे और कभी भी उनकी अवहेलना नहीं करते थे । उनका भाव इस जीव सृष्टि को इसके प्राकृतिक सौंदर्य सहित जीवान्त बनाये रखा । वे चाहते थे कि यह सारी सृष्टि पशु-पक्षियों, वृक्षों, फल-फूल आदि समूची प्रकृति के लिए जीवन्त रहे । उनका कहना था कि राजा का धर्म वैदिक जीवन का प्रसार करना है ना कि अपनी प्रजा से आज्ञापालन करवाना । उन्हें भार्गव के नाम से भी जाना जाता है । पितामह भृगु द्वारा सम्पन्न नामकरण संस्कार के अनन्तर राम, जमदग्नि का पुत्र होने के कारण जामदग्न्य और शिव जी द्वारा वरदान स्वरूप प्रदत्त परशु धारण किए रहने के कारण परशुराम कहलाये ।
भगवान श्री परशुराम जी महाराज की आरंभिक शिक्षा महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचिक के आश्रम में प्राप्त होने के साथ ही महर्षि ऋचिक से सारंग नामक दिव्य वैष्णव धनुष और ब्रह्मर्षि कश्यप से विधिवत अविनाशी वैष्णव मंत्र प्राप्त हुआ । तदन्तर कैलाश गिरीश्रृंग पर स्थित भगवान शंकर जी के आश्रम में विघा प्राप्त कर विशिष्ट दिव्यास्त्र विघुदभि नामक परशु प्राप्त किया । भगवान शिव जी से उन्हें श्री कृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्त्रोत एवं मंत्र कल्पतरू भी प्राप्त हुए । भगवान श्री परशुराम जी महाराज द्वारा चक्रतीर्थ में किए कठिन तप से प्रसन्न होकर भगवान नारायण ने उन्हें त्रेतायुग में राम अवतार होने पर तेजोरहण के उपरान्त कल्पान्त पर्यन्त तपस्यारत भूलोक पर रहने का वरदान दिया । भगवान श्री परशुराम जी महाराज ने अधिकांश विघा अपने बाल्यकाल में, अपनी माता की शिक्षाओं से ही सीख ली थी ।
राम से कैसे बने परशुराम?
बाल्यावस्था में परशुराम के माता-पिता इन्हें राम कहकर पुकारते थे। जब राम कुछ बड़े हुए तो उन्होंने पिता से वेदों का ज्ञान प्राप्त किया और पिता के सामने धनुर्विद्या सीखने की इच्छा प्रकट की। महर्षि जमदग्रि ने उन्हें हिमालय पर जाकर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कहा। पिता की आज्ञा मानकर राम ने ऐसा ही किया। उस बीच असुरों से त्रस्त देवता शिवजी के पास पहुंचे और असुरों से मुक्ति दिलाने का निवेदन किया। तब शिवजी ने तपस्या कर रहे राम को असुरों को नाश करने के लिए कहा। राम ने बिना किसी अस्त्र की सहायता से ही असुरों का नाश कर दिया। राम के इस पराक्रम को देखकर भगवान शिव ने उन्हें अनेक अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। इन्हीं में से एक परशु (फरसा) भी था। यह अस्त्र राम को बहुत प्रिय था। इसे प्राप्त करते ही राम का नाम परशुराम हो गया।
अमर हैं भगवान परशुराम
हिंदू धर्म ग्रंथों में कुछ महापुरुषों का वर्णन है जिन्हें आज भी अमर माना जाता है। इन्हें अष्टचिरंजीवी भी कहा जाता है। इनमें से एक भगवान विष्णु के आवेशावतार परशुराम भी हैं-
अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण।
कृप: परशुराम श्च सप्तैते चिरजीविन ।।
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टम्।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।
इस श्लोक के अनुसार अश्वत्थामा, राजा बलि, महर्षि वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, भगवान परशुराम तथा ऋषि मार्कण्डेय अमर हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान परशुराम वर्तमान समय में भी कहीं तपस्या में लीन हैं।
परशुराम का कर्ण को श्रापमहाभारत के अनुसार परशुराम भगवान विष्णु के ही अंशावतार थे। कर्ण भी उन्हीं का शिष्य था। कर्ण ने परशुराम को अपना परिचय एक सूतपुत्र के रूप में दिया था। एक बार जब परशुराम कर्ण की गोद में सिर रखकर सो रहे थे। उसी समय कर्ण को एक भयंकर कीड़े ने काट लिया। गुरु की नींद में विघ्न न आए ये सोचकर कर्ण दर्द सहते रहे, लेकिन उन्होंने परशुराम को नींद से नहीं उठाया। नींद से उठने पर जब परशुराम ने ये देखा तो वे समझ गए कि कर्ण सूतपुत्र नहीं बल्कि क्षत्रिय है। तब क्रोधित होकर परशुराम ने कर्ण को श्राप दिया कि मेरी सिखाई हुई शस्त्र विद्या की जब तुम्हें सबसे अधिक आवश्यकता होगी, उस समय तुम वह विद्या भूल जाओगे। इस प्रकार परशुरामजी के श्राप के कारण ही कर्ण की मृत्यु हुई।

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